Monday, 10 February 2014

                                                                "साइको समीक्षा "




मानसिक रूप से बीमार एक इंसान कैसे दो  व्यक्तित्व को जीता है , व जाने अनजाने में अपराध कर बैठता है  , इसी को बयां करती है 'साइको '


 फ़िल्म की लीड प्रोटोगोनिस्ट मरियन( जैनेट लेई )  है , जो  एक दिन अपने ऑफिस से ४०००० $ ले कर रफूचक्कर हो जाती है। इसके बाद  साइकोफिल्म नार्मन बेट्स ( अन्थोनी पर्किन्स ) के इर्द गिर्द घूमती है।

 १९६० के दसक में  बनी ये फ़िल्म हिच्कॉक के बेहतरीन फिल्मो में सेएक है।  फ़िल्म में विभिन्न प्रकार के कैमेरा एंगेल व शॉट्स है , जो इस फ़िल्म को और भी खूबसूरत बनाता है।  अगर एंगेल की बात करें तो बर्ड आईज एंगेल , गोड आईज एंगेल , हाई एंगेल , लौ एंगेल वही शॉट्स में क्लोज अप  , मिड शॉट तथा पैन शॉट इत्यादि यूज़ हुआ है।

फ़िल्म में मरियन के मर्डर का सीन उस समय के अनुसार बहुत ही हिंसात्मक था।  बाथरूम के अंदर जिस प्रकार नार्मन,  मरियन को   चाक़ू घोंप कर मरता है  उसे देख रोंगटे खड़े हो जाते है।  मर्डर के बाद मरियन के बॉडी से निकलने वाले खून का क्लोज अप शॉट बड़ा ही अनोखा है , इसके अनोखे होने क पीछे बिना टेक्नोलॉजी के  ब्लैक एंड वाइट फ़िल्म में खून व पानी को एक साथ दिखाना है।

 फ़िल्म का म्यूजिक फ़िल्म के सस्पेंस को और आकर्षक बनाता है।  अगर अब फ़िल्म में अभिनयकी बात करे तो डबल पेर्सोनॉल्टी डिसऑर्डर का शिकार नार्मन बेट्स ने जबर्दस्त अभिनय किया है।  एक साइको पेसेंटकी  छोटी  से छोटी  बात जैसे टेंशन में दांत पिसना , हाथ मलना ऐसे कई लक्षण नार्मन की अभिनय में नजर आता है।

फ़िल्म की स्टोरी रोबर्ट ब्लोच द्वारा लिखित नोवेल साइको  पर आधारित है , जिसका स्क्रीन प्ले  जोसफ स्टेफनो  ने लिखा है , डायरेक्शन अल्फ्रेड हिटकॉक ने किया है  व  फ़िल्म का म्यूजिक बारनार्ड हरमन ने दिया है तथा  जॉर्ज टोमसिनी ने फ़िल्म को एडिट किया है।

( जैसा कि मैंने व्यक्तिगत तौर पर फ़िल्म कि समझने कि कोशिश की , मुझे इस फ़िल्म में फ़िल्मी दुनिया के ऑचर थ्योरी , फोरग्राउन्डिंग  थ्योरी कंस्ट्रक्टिविसम मोन्टाज थ्योरी देखने को   मिला।   )

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