अछूत कन्या " प्यार और त्याग की कहानी"
प्यार न देखे जात - पात , पर समाज तो हमेशा से यही देखता आया है। फ़िल्म की कहानी सामाज में फैली छुआ - छूत व उंच - नीचे को ध्यान में रखकर बनायीं गयी है।
फ़िल्म की शुरुआत मिड पैन शॉट के साथ रेलवे फाटक के खुलने से होती है , जहाँ से फ़िल्म कि पूरी कहानी फ्लैशबैक में चली जाती है। फ़िल्म की मुख्य कहानी प्रताप ( अशोक कुमार ) व कस्तूरी ( देविका रानी ) के प्रेम पर है। कस्तूरी अछूत जात की लड़की है , जबकि प्रताप ब्राह्मण कुल का। दोनों एक दूसरे से बेहद प्यार करते है , पर जात - पात में अंतर होने से समाज उनके प्यार को स्वीकार नहीं करती , जिसका परिणाम एक दिन प्यार से त्याग में बदल जाता है।
फ़िल्म के शॉट अधिकांशतः क्लोज अप व मिड लिए गए है। जिससे अभिनय करता के भावनाओ का साफ़ पता चलता है। फ़िल्म को एक छोटी सी जगह पर शूट किया गया है , पर स्थानो की भिनयता व खूबसूरती को कैमरे के माध्यम से निर्देशक ने बड़े ही नजाकत से परदे पर उकेरा है।
फ़िल्म में कस्तूरी व प्रताप के प्रेम के अलावा एक और कहानी है , जो फ़िल्म को और भी आकर्षक बनाती है , जो है दो वैद्यो कि आपसी तकरार। फ़िल्म के कई डाइलोग दिल को सीधे छूटे है , जैसे " या तो मेल ना करें और मेल करें तो अंत तक निभाये ", " प्रेम तो भगवान् का रूप है , इसे जात - पात के बंधन में ना बांधे "
फ़िल्म में सरस्वती देवी का म्यूजिक है , जो सिर्फ गाने के वक़्त सुनायी पड़ती है। फ़िल्म में बैकग्राउंड म्यूजिक की कमी है , पर डाइलोग उसकी कमी महसूस नहीं होने देती। फ़िल्म के डायलॉग फ़िल्म को जीवांत करने में कोई कसर नहीं छोडती है।
अभिनय की बात करे तो , फ़िल्म में किसी ने भी निराश नहीं किया है , फिर चाहे , कस्तूरी हो , प्रताप हो , मोहन हो या फिर दुखिया। सब ने जबर्दस्त अभिनय का परिचय दिया है।
फ़िल्म का निर्देशन फ्रैंज आस्टन ने किया है , जिन्होंने फ़िल्म की आत्मा को समझने व बयाँ करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।
(जैसा कि मैंने व्यक्तिगत तौर पर फ़िल्म समझने कि कोशिश की , मुझे इस फ़िल्म में फ़िल्मी दुनिया के ऑचर थ्योरी , फोरग्राउन्डिंग फ़िल्म में देखने को मिला। )
प्यार न देखे जात - पात , पर समाज तो हमेशा से यही देखता आया है। फ़िल्म की कहानी सामाज में फैली छुआ - छूत व उंच - नीचे को ध्यान में रखकर बनायीं गयी है।
फ़िल्म की शुरुआत मिड पैन शॉट के साथ रेलवे फाटक के खुलने से होती है , जहाँ से फ़िल्म कि पूरी कहानी फ्लैशबैक में चली जाती है। फ़िल्म की मुख्य कहानी प्रताप ( अशोक कुमार ) व कस्तूरी ( देविका रानी ) के प्रेम पर है। कस्तूरी अछूत जात की लड़की है , जबकि प्रताप ब्राह्मण कुल का। दोनों एक दूसरे से बेहद प्यार करते है , पर जात - पात में अंतर होने से समाज उनके प्यार को स्वीकार नहीं करती , जिसका परिणाम एक दिन प्यार से त्याग में बदल जाता है।
फ़िल्म के शॉट अधिकांशतः क्लोज अप व मिड लिए गए है। जिससे अभिनय करता के भावनाओ का साफ़ पता चलता है। फ़िल्म को एक छोटी सी जगह पर शूट किया गया है , पर स्थानो की भिनयता व खूबसूरती को कैमरे के माध्यम से निर्देशक ने बड़े ही नजाकत से परदे पर उकेरा है।
फ़िल्म में कस्तूरी व प्रताप के प्रेम के अलावा एक और कहानी है , जो फ़िल्म को और भी आकर्षक बनाती है , जो है दो वैद्यो कि आपसी तकरार। फ़िल्म के कई डाइलोग दिल को सीधे छूटे है , जैसे " या तो मेल ना करें और मेल करें तो अंत तक निभाये ", " प्रेम तो भगवान् का रूप है , इसे जात - पात के बंधन में ना बांधे "
फ़िल्म में सरस्वती देवी का म्यूजिक है , जो सिर्फ गाने के वक़्त सुनायी पड़ती है। फ़िल्म में बैकग्राउंड म्यूजिक की कमी है , पर डाइलोग उसकी कमी महसूस नहीं होने देती। फ़िल्म के डायलॉग फ़िल्म को जीवांत करने में कोई कसर नहीं छोडती है।
अभिनय की बात करे तो , फ़िल्म में किसी ने भी निराश नहीं किया है , फिर चाहे , कस्तूरी हो , प्रताप हो , मोहन हो या फिर दुखिया। सब ने जबर्दस्त अभिनय का परिचय दिया है।
फ़िल्म का निर्देशन फ्रैंज आस्टन ने किया है , जिन्होंने फ़िल्म की आत्मा को समझने व बयाँ करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।
(जैसा कि मैंने व्यक्तिगत तौर पर फ़िल्म समझने कि कोशिश की , मुझे इस फ़िल्म में फ़िल्मी दुनिया के ऑचर थ्योरी , फोरग्राउन्डिंग फ़िल्म में देखने को मिला। )


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