जमीन किसानो की माँ होती है...
किसानो के लिये उनकी जमीन से बढ़कर कुछ नहीं होता। वो अपनी जमीन को अपनी माँ की तरह पूजते है। और अगर एक दिन कोई उनकी जमीन उनसे छीन ले तो , उनकी जिंदगी मौत से भी बदत्तर हो जाती है।
विमल रॉय द्वारा निर्देशित फ़िल्म दो बीघा जमीन में जमीदारो द्वारा गरीब किसानो पर किये जाने वाले अत्याचार को बड़ी मरमरता से परदे पर उकेरा गया है। १९५३ में बनी फ़िल्म एक ब्लैक एंड वाइट फ़िल्म है। फ़िल्म की कहानी किसान शम्भू महतो (बलराज साहनी ) के इर्द गिर्द घूमती है , जिनका जमीन धोखे से जमीदार के हाथ में चला जता है। जमीन को वापस पाने के लिए शम्भू जिस प्रकार संघर्ष करता है , व परेशानियो से गुजरता है इसको बड़ी ही नाजुकता से बताया गया है।
फ़िल्म में अगर कैमेरा एंगलिंग कि बात करे तो सबसे ज्यादा पैन शॉट्स व मास्टर शॉट्स यूज़ हुआ है। खेतो में किसानो का काम करना , शम्भू का रिक्शा खीचना ऐसे कई शॉट्स है जो पैन शॉट्स से फ़िल्म को और भी खूबसूरत बनाता है।
फ़िल्म कि एडिटिंग नॉन लीनियर है। टेक्नोलॉजी के आभाव में भी जिस प्रकार से फ़िल्म कि एडिटिंग की गयी है वो काफी सुन्दर व सराहनीय है। फ़िल्म के एक शॉट में जब शम्भू रिक्शा खिचता है , तथा एक सीन धीरे - धीरे गायब व दूसरा सीन धीरे - धीरे परदे पर उकेरता है वो बड़ा ही आकर्षक है।
फ़िल्म में अगर म्यूजिक की बात करें तो सलिल चौधरी ने वायलिन का बैकग्राउंड में यूज़ बड़ी ही मधुरता से किया है।
अभिनय के बारे में बात करे तो शम्भू की पत्नी पारवती 'पारो ' ( निरुपा रॉय ) ने बड़ा ही अच्छा अभिनय किया है , शम्भू के रूप में बलराज साहनी भी की अभिनय फ़िल्म में जीवंतता लाती है। पर व्यक्तिगत जिस कलाकार ने मुझे प्रभवित किया वो है 'कन्हैया ' ( रतन कुमार )
अगर अब कहानी व निर्देशन की बात करे तो , जिस प्रकार से फ़िल्म को आजादी के पहले का दिखाया गया है उसमे विमल रॉय का निर्देशन प्रसंसनीय है। फ़िल्म में छोटे से छोटे चीज को रॉय ने ध्यान से परदे पर लाये है।
( जैसा कि मैंने व्यक्तिगत तौर पर फ़िल्म कि समझने कि कोशिश की , मुझे इस फ़िल्म में फ़िल्मी दुनिया के ऑचर थ्योरी , फोरग्राउन्डिंग थ्योरी देखने को मिला। मिला साथ ही अगर बात करे तो रस थ्योरी व ध्वनि थ्योरी भी है जो इस फ़िल्म में देखने को मिलता है। )
किसानो के लिये उनकी जमीन से बढ़कर कुछ नहीं होता। वो अपनी जमीन को अपनी माँ की तरह पूजते है। और अगर एक दिन कोई उनकी जमीन उनसे छीन ले तो , उनकी जिंदगी मौत से भी बदत्तर हो जाती है।
विमल रॉय द्वारा निर्देशित फ़िल्म दो बीघा जमीन में जमीदारो द्वारा गरीब किसानो पर किये जाने वाले अत्याचार को बड़ी मरमरता से परदे पर उकेरा गया है। १९५३ में बनी फ़िल्म एक ब्लैक एंड वाइट फ़िल्म है। फ़िल्म की कहानी किसान शम्भू महतो (बलराज साहनी ) के इर्द गिर्द घूमती है , जिनका जमीन धोखे से जमीदार के हाथ में चला जता है। जमीन को वापस पाने के लिए शम्भू जिस प्रकार संघर्ष करता है , व परेशानियो से गुजरता है इसको बड़ी ही नाजुकता से बताया गया है।
फ़िल्म में अगर कैमेरा एंगलिंग कि बात करे तो सबसे ज्यादा पैन शॉट्स व मास्टर शॉट्स यूज़ हुआ है। खेतो में किसानो का काम करना , शम्भू का रिक्शा खीचना ऐसे कई शॉट्स है जो पैन शॉट्स से फ़िल्म को और भी खूबसूरत बनाता है।
फ़िल्म कि एडिटिंग नॉन लीनियर है। टेक्नोलॉजी के आभाव में भी जिस प्रकार से फ़िल्म कि एडिटिंग की गयी है वो काफी सुन्दर व सराहनीय है। फ़िल्म के एक शॉट में जब शम्भू रिक्शा खिचता है , तथा एक सीन धीरे - धीरे गायब व दूसरा सीन धीरे - धीरे परदे पर उकेरता है वो बड़ा ही आकर्षक है।
फ़िल्म में अगर म्यूजिक की बात करें तो सलिल चौधरी ने वायलिन का बैकग्राउंड में यूज़ बड़ी ही मधुरता से किया है।
अभिनय के बारे में बात करे तो शम्भू की पत्नी पारवती 'पारो ' ( निरुपा रॉय ) ने बड़ा ही अच्छा अभिनय किया है , शम्भू के रूप में बलराज साहनी भी की अभिनय फ़िल्म में जीवंतता लाती है। पर व्यक्तिगत जिस कलाकार ने मुझे प्रभवित किया वो है 'कन्हैया ' ( रतन कुमार )
अगर अब कहानी व निर्देशन की बात करे तो , जिस प्रकार से फ़िल्म को आजादी के पहले का दिखाया गया है उसमे विमल रॉय का निर्देशन प्रसंसनीय है। फ़िल्म में छोटे से छोटे चीज को रॉय ने ध्यान से परदे पर लाये है।
( जैसा कि मैंने व्यक्तिगत तौर पर फ़िल्म कि समझने कि कोशिश की , मुझे इस फ़िल्म में फ़िल्मी दुनिया के ऑचर थ्योरी , फोरग्राउन्डिंग थ्योरी देखने को मिला। मिला साथ ही अगर बात करे तो रस थ्योरी व ध्वनि थ्योरी भी है जो इस फ़िल्म में देखने को मिलता है। )

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