Friday, 7 March 2014

                                                          ह्यूगो मनसटरबर्ग....




ह्यूगो मनसटरबर्ग एक जर्मन - अमेरिकन मनोवैज्ञानिक थे।  उनको   साहित्य , कविता , विदेशी भाषा , व संगीत से बड़ा लगाव था।  और अपने इस लगाव को अपनी सोच का हिस्सा बनाते गए , और एक दिन  एक महान मनोवैज्ञानिक बने।  फिल्मो को ऑब्ज़र्व करने का उनका अपना अलग हीअंदाज था।

सिनेमा दिमाग कि कला है , जिसे हम दिमाग  से समझते है, ठीक उसी तरह जैसे संगीत को कान , से चित्रकला को आँख से।  सिनेमा सामाजिक ताना वाना व तकनिकी का समन्वय है।  जिसके माध्यम से हम किसी भी विषय को व्यापक स्तर पर समझते है।


ह्यूगो मनसटरबर्ग कमेरा व उसके प्रयोग के बारे में बताते हुए कहते है , कि  क्लोज अप शॉट्स व विभिन्न प्रकार के कैमेरा छोर कैमरा के लेन्स से नहीं बल्कि इंसान कि सोच से होता है। यह एक फ़िल्म निर्देक के कार्य कुशलता पर निर्भर करता है , कि वह कैसे व किस प्रकार से इन तकनीकियों का फ़िल्म में प्रयोग करता है।

फ़िल्म हमारे मानसिक स्थिति का प्रतिविम्व होता है , जो हमारी मानसिक सोच को प्रतिबिंबित करता है।  फ़िल्म संसार और हमारे बीच कि कड़ी नहीं , बल्कि ये हमारे सोच और फ़िल्म के बिच कि कड़ी है।  फ़िल्म एक ऑब्जेट है , जो हमारे दिमाग को प्रभावित करती है।

वास्तव में फ़िल्म एक ओब्जक्ट ही है , जिसे कई भागो में जोड़कर दिखया जाता है।  उनका जो व्यक्तिगत सोच फ़िल्म के बारे में था , वो था , कि फ़िल्म बिना कहानी के मात्र एक उपकरण है , जिसे प्रयोग करने के लिए कहानी कि जरुरत होती है।  फ़िल्म में कहानी का होना बहुत जरुरी होता है।


ये कहानी कुछ भी नहीं होने चाहिए , कहानी वो होने चाहिए जिसके सामाजिक विकास व समाज उत्थान में भूमिका हो।   फ़िल्म में खासकर तीन चीज होती है , सूचना , शिक्षा व मनोरंजन।  ये तीन चीजे फ़िल्म के कहानी को आगे बढ़ाती है।  किसी भी फ़िल्म में इन तीन चीजो का होना बहुत आवशयक होता है ,


  


                             नाट्यशास्त्र 




नाटकों के संबंध में शास्त्रीय जानकारी को नाट्य शास्त्र कहते हैं। इस जानकारी का सबसे पुराना ग्रंथ भी नाट्य-शास्त्र के नाम से जाना जाता है। इसके रचयिता भरत मुनि थे। भरत मुनि का काल ४०० ईपू के निकट माना जाता है। संगीत, नाटक, और अभिनय के संपूर्ण ग्रंथ के रूप में भारतमुनि के नाट्य शास्त्र का आज भी बहुत सम्मान है। उनका मानना है कि नाट्य शास्त्र में केवल नाट्य रचना के नियमों का आकलन नहीं होता बल्कि अभिनेता रंगमंच और प्रेक्षक इन तीनों तत्वों की पूर्ति के साधनों का विवेचन होता है।

37 अध्यायों में भरतमुनि ने रंगमंच अभिनेता अभिनय नृत्यगीतवाद्य, दर्शक, दशरूपक और रस निष्पत्ति से संबंधित सभी तथ्यों का विवेचन किया है। भरत के नाट्य शास्त्र के अध्ययन से यह स्पष्ट हो जाता है कि नाटक की सफलता केवल लेखक की प्रतिभा पर आधारित नहीं होती बल्कि विभिन्न कलाओं और कलाकारों के सम्यक के सहयोग से ही होती है। 

नाट्यशास्त्र (भारतीय) नाट्य और नृत्त, दृश्य काव्य के ये दो भेद हैं। नट नटी द्वारा किसी अवस्थाविशेष की अनुकृति नाट्य है - 'नाट्यते अभिनयत्वेन रूप्यते- इति नाट्यम्'। ताल और लय की संगति से अनुबद्ध अनुकृत को नृत्त कहते हैं। ये दोनों ही अभिनय के विषय हैं और ललित कला के अंतर्गत माने जाते हैं। नाट्य के प्रमुख अंग चार हैं - वाचिक, सात्विक, आंगिक और आहार्य। उक्ति-प्रत्युक्ति की यथावत् अनुकृति वाचिक अभिनय का विषय है।



 भावों का यथावत् प्रदर्शन सात्विक अभिनय है। भावप्रदर्शन के लिए हाथ, पैर, नेत्र, भ्रू, एवं कटि, मुख, मस्तक आदि अंगों की विविध चेष्टाओं की अनुकृति आंगिक अभिनय है। देशविदेश के अनुरूप वेशभूषा, चालढाल, रहन सहन और बोली की अनुकृति आहार्य अभिनय का विषय है। चतुर्विध अभिनय के सहायक नृत्य, गीत, वाद्य एवं गति, वृत्ति, प्रवृत्ति और आसन का अनुसंधान भी नाट्य के अंतर्गत है। इस प्रकार अभिनय के विविध अंग एवं उपांगों के स्वरूप और प्रयोग के आकारप्रकार का विवरण प्रस्तुत कर तत्संबंधी नियम तथा व्यवहार को निर्धारित करनेवाला शास्त्र 'नाट्यशास्त्र' है।



इस प्रकार अभिनय के विविध अंग एवं उपांगों के स्वरूप और प्रयोग के आकारप्रकार का विवरण प्रस्तुत कर तत्संबंधी नियम तथा व्यवहार को निर्धारित करनेवाला शास्त्र 'नाट्यशास्त्र' है। अभिनय के अनुरूप स्थान को नाट्यगृह कहते हैं जिसके प्रकार, निर्माण एवं साजसज्जा के नियमों का प्रतिपादन भी नाट्यशास्त्र का ही विषय है। विविध श्रेणी के अभिनेता एवं अभिनेत्री के व्यवहार, परस्पर संलाप और अभिनय के निर्देशन एवं निर्देशक के कर्तव्यों का विवरण भी नाट्यशास्त्र की व्यापक परिधि में समाविष्ट है।





 इसका मुख्य उद्देश्य ऐहिक जीवन की नाना वेदनाओं से परिश्रांत जनता का मनोरंजन है - यह देव, दानव एवं मानव समाज के लिए आमोद प्रमोद का सरल साधन है। यह नयनों की तृप्ति करनेवाला एवं भावोद्रेक का परिमार्जन कर प्रेक्षकवर्ग का आह्लादित करनेवाला मनोरम अनुसंधान है - यह जातिभेद, वर्गभेद, वयोभेद आदि नैसर्गिक एवं सामाजिक विभेदों से निरपेक्ष, भिन्न रुचि की जनता का सामान्य रूप से समाराधन करनेवाला एक कांत, 'चाक्षुषक्रतु' है।


                                                   Rasa theory  (रस सिद्धांत)





 रस थ्योरी किसी कला का स्वाद है।  जिसके आभाव में कला स्वाद हिन् है।  जीवन में जैसे विभिन्न प्रकार के समय आते जाते है और उनके अनुसार हमरे जीने के तरीके में बदलाव होता है ठीक उसी तरह रसा थ्योरी नाटक में बदलाव को व्यक्त रस सिद्धांत करती है। 

रसा थ्योरी के बारे में बताया जाता है कि इसकी खोज भारत में हुयी थी।  भारत मुनि वो पहले इंसान थे जिसने रस थ्योरी वा इसकी उपयोगिता का अध्यायन किया।  रसा थ्योरी मुखतः नृत्य , नाटक के भावो को अभव्यक्त करती है।  नाटक एक ऐसी कला है जो लोगो का न केवल मनोरंजन करती है, बल्कि लोगो को शिक्षित व जागरूक भी करती है।  ऐसे में बड़ा प्रश्न ये उठता है , कि कैसे हैम अपने नाटक का प्रस्तुतीकरण करे कि वो अधिक से अधिक लोगो को प्रभावित कर सके। 

नाटक में मुख्यतः ध्वनि व भावनाओ का अभिव्यक्तिकरण ही ऐसे दो घटक है , जो नाटक के अर्थ  को दर्शको को समझाती है। भारतीय परिप्रेक्ष्य में यदि हैम बात करे तो आज फिल्मो व टेलीविज़न के इतने प्रभाव के बावजूद भी लोगो का लगाव नाटक  के प्रति बना है।  जिसका दो कारन हो सकता है एक तो वास्तविक कला को देखने के प्रति लोगो कि रूचि व दूसरा जटिल से जटिल विषयो को नाटक के माध्यम से समझना। 

रसा थ्योरी के अनुसार आठ भावो को मुनष्य के अंदर देखा जा सकता है , तथा जिसके अभिव्यक्ति कारन मनुष्य द्वारा होता है।   ये आठो रसा किसी भी नाटक या नृत्य के लिये शारीर में आत्मा कि तरह होती है। 

रस के आठ प्रकार - श्रृंगार रस , हास्य रस ,रौद्र रस , करुण रस , वीभत्स रस , भयानक रस , वीर रस व अद्भुत रस।  ये वो आठ रस है जो भरत मुनि ने प्रस्तुत किया था , आगे चलकर अभिनव गुप्ता जो कि एक बड़े स्कॉलर थे उन्होंने नौए रस कि बात कही।  उन्होंने बताया कि एक और रस है जो इन्ही रसो के भाति महत्वपूर्ण व उपयोगी है।  अभिनव गुप्ता के अनुसार शांत रस भी एक आवश्यक रस है जो रसा थ्योरी का भाग है। 



उपरोक्त हाथो रासो के बारे में बता दिया गया है , अब प्रश्न है , कि हर रस एक दूसरे से किस तरह भिन्न है व उसकी अपनी क्या पहचान है।  जो पहला रस है वो है है श्रृंगार रस जिसका मतलब प्यार , मोहब्बत व लगाव से होता है  . इस रस को हरे रंग से प्रदर्शित किया जाता है।  जब नाटक में हमें कुछ ऐसा दिखाना होता है तो या तो हम स्टेज के लाइट का रंग हरा कर देते है , या कलाकारो के चहरे को हरे रंग से प्रदर्शित करते है। 

दूसरा रस हास्य है जिसका तात्पर्य मनोरंजन से होता है।  नाटक में मनोरंजन का होना बहुत जरुरी है अतः इस रस के माध्यम से कलाकार अपने दर्शको को अपने भावो को बताताहै।  जो अगला रस है वो है रौद्र जैसा कि नाम से ही पता चलता है इसका तात्पर्य गुस्से से होता है।   जब हमारे इच्छाओ को अनदेखा किया जाए या  तो अक्सर हमें सामने वाले इंसान पर गुस्सा आता है जो रौद्र रस को प्रदर्शित करता है। 

करुणा रस हमरे मानवी संवेदनाओ का व्यक्ति करण है , जिसका तात्पर्य मोह माया , व दयालुता से जुड़ा होता है।  इस रस को ग्रे कलर से प्रदर्शित किया जता है।  वीभत्स रस इस रस को नीले रंग से प्रदर्शित किया जाता है।  इस रस का तात्पर्य  कुछ ऐसी चीजो से होता है जो हमें पसंद ना हो , जिससे हमें घृणा आती हो।  जो अगला रस है वो है भयानक रस जिसका तात्पर्य आतंक से जुड़ा होता है , ऐसा कुछ भी जो लोगो को भयभीत करे , डराये ये लोगो में आतंक फैलाये वो इस रस के अंतर्गत आता है।  इस रस को काले रंग से प्रदर्शित किया जता है।



रस की जब हम आगे बात करते है तो अगला रस है वीर जिसका जुड़ाव शौर्य , उत्साह  व प्रक्रम से होता है इस रस को पीले रंग से प्रदर्शित किया जाता है।  जो अंतिम रस है वो है अद्भुत जैसा कि नाम से ही पता चलता है ये कुछ ऐसे भाव के बारे में बात करता है जो एक दम आश्चर्यचकित कर देने वाला हो , मतलब कुछ ऐसा अविश्सनीय हो।  इस रस को पीले रंग से प्रदर्शित किया जाताहै।  अभिनव गुप्ता द्वारा जोड़ा गया शांत रस शांति व शंतुष्टि के बारे में बात करती है , इस रस को नीले रंग से प्रदर्शित किया जता है। 


ये थे वो रस जो भारतीय पारम्परिक नाटको कि आत्मा है , जिसके बिना नाटक नीरस व वेसवाद है।


                         
                           दर्शक  ( spectator )





कला कोई भी हो अगर जब तक उसका दर्शक ना हो कला का कोई महत्व नहीं होता।  किसी भी कला के लिए दर्शक सिर्फ इसलिए महत्वपूर्ण नहीं कि वो उसे देखते है , बल्कि इसलिए भी महत्वपूर्ण होता ही , कि उसके द्वारा दिए गए फीडबैक से कलाकार का सम्मान व विश्वास बढता है। अगर   एक दर्शक किसी भी कला का आलोचक होता है तो साथ ही साथ वो उसका समालोचक भी होता है।  जरुरत पड़ने पर सराहना  करता है , तो वही खमियां दिखने पर आलोचना भी करता है। 

दर्शक के सराहने पर ही कला व कलाकार का महत्व बढता है।  आदिकाल से ये धारणा चली आ रही है , कि अगर कोई कला उसके दर्शको को पसंद ना आये तो वो कला ही नहीं बल्कि कलाकारदोनो ही व्यर्थ है।  पहले के जमाने में तो अगर राजा महराजा को कलाकारो कि कलाकारी अगर पसंद नहीं आती  थी , तो उन्हें इसकी सजा दी जाती थी।  कभी = कभी तो उनके कला के लिए उन्हें सजाये मौत भी दे दी जाती थी।  उदाहरण के तौर पर ताजमहल का कारीगर हालाँकि यहाँ उसको इसलिए नहीं मारा गया , कि उसकी कलाकारी बेकार थी , बल्कि इस लिए मरा गया कि वो दुबारा ऐसा नायाब चीज ना बना सके। हालाँकि ये तो हो गया कला व कलाकार की बात।  पर आज यहाँ हैम जिस दर्शक कि बात कर रहे है वो  मुखतः फ़िल्म का दर्शक होताहै।  



आज वर्त्तमान  में दर्शको का स्तर व महत्व काफी बढ़ गया है , अब दर्शक कला को सिर्फ मनोरंजन कि दृष्टि से ही नहीं बल्कि शिक्षा , संस्कृति, ज्ञान व कई अन्य  दृष्टिकोण से देखतेहै।  अगर आज के दर्शको को एक आलोचक कहा जाए तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। 

  हर दर्शक का कला   को देखने का नजरिया एक ही नहीं  होता।  कुछ किसी दृष्टिकोण से देखते है तो कुछ किसी और दृष्टिकोण से देखते है।  कोई भी कला कार जब तक अपने अभिनय से दर्शक के दिल को ना छू ले कला नीरस व बेजान होता है। 

कलाकार व दर्शक का संबंध बहुत ही गहरा होता है।  अगर हम कहे कि एक के बिना दूसरे का कोई अस्तित्व नहीं तो ये भी गलत नहीं होगा।  अगर दर्शक कला को देखने में रूचि ही ना दिखाए तो कला का क्या मतलब और अगर कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन ही ना करे तो दर्शक का क्या काम ?


एक दर्शक तो पूरी तरह समीक्षक नहीं होता , फिर भी उसके अंदर वो सारे गुण होते है जिसके अनुसार वो किसी कला को  अपने विवेक से परखता सकता  है।  




                           ध्वनि क्या है ?





ध्वनि सिद्धांत  के जनक आनंदवर्धन को मना जाता है।  ये भारतीय सिद्धान्त है जो , कविता कि आत्मा होती है।  आनदवर्धन ध्वनियलोका  नामक पुस्तक के लेखक भी थे , जिनका मानना था , कि कविता भाव उसी रूप में जिस रूप में कवी लिखता है  तभी  उसके श्रोताओ तक पहुचेगा जब उसमे ध्वनि हो।
वायुमण्डल में तरंगों की हलचल को ध्वनि कहा जाता है। ध्वनि कुछ भी हो सकता है हवा के चलने कि ध्वनि, बिजली कड़कने कि ध्वनि, बारिश कि ध्वनि , पक्षियों के चहचहाने कि ध्वनि, मोटर कार कल कारखानो व मशीनो के चलने कि ध्वनि ये कुछ भी हो सकती है।  ध्वनि को हम उसके प्रकृति के अनुसार कई भागो में बाँट कर देख सकते है।

तेज ध्वनि, मधुर ध्वनि, उच्चारण में उदात्त, अनुदात्त, स्वरित इत्यादि ध्वनियों के अनेकानेक भेद हैं। बहुत से लोग ध्वनियों के माध्यम से पशु-पक्षियों की पहचान कर लेते हैं। आजकल ध्वनि प्रदूषण से शहर काँप रहे हैं। निवारण के लिए ध्वनिरोधक लगा रहे हैं, वृक्षारोपण कर रहे हैं किन्तु अध्यात्म में इन ध्वनियों का कोई उपयोग नहीं है। अध्यात्म में जिस ध्वनि की बहुत बड़ी महिमा है वह भजन की जागृति के साथ है।

ध्वनि का हमारे जीवन में बहुत बड़ीभूमिका होती है।  ध्वनि न सिर्फ हमरा ध्यान किसी ओर करती है , बल्कि उस ध्वनि का उससे एक रिश्ता भी बताती है।  उदाहरणार्थ - आदिकाल में युद्ध शुरू होने के पहले  संख कि ध्वनि होती थी , जो युद्ध के शुरू होने का संकेत देती थी।  इसी तरह कोई सूचना देने के लिए ढोल नगाड़े से लोगो को सूचित किया जाता था। 


आज हम जिस विषय को ध्यानगत रखकर यहाँ ध्वनि कि बात कर रहे है , वो है फ़िल्म।  वैसे तो फ़िल्म में ध्वनि नहीं बल्कि संगीत होती है , पर इस संगीत कि भी उत्पाती ध्वनि से ही होती है।  हर संगीत यंत्रो से ध्वनि निकलती है , जो सरगम के सात रंग में घुलकर संगीत बन जाती है। 


फिल्मो में अगर संगीत कि बात करे तो विशेषकर भारतीय फिल्मो में ये रेलवे ट्रैक पर रेल कि तरह होता है।  कहने का तात्पर्य जिस प्रकार रेल पटरी पर चलती है , उसे पटरी के माध्यम से आगे बढ़ाया जाता है उसी प्रकार फिल्मो को लोकप्रिय बनाने में संगीत का काम होता है।  




           काबुकी परंपरागत जापानी थियेटर शैली .





काबुकी  जापान की एक बहु पुरानी थिएटर आर्ट है।  काबुकी के अंतर्गत   नाट्य शैलियों की अच्छी तरह से जाना जाता है।   नाटक ; अभिनेताओं ' गतियों की लयबद्ध अनुग्रह , रंगीन मेकअप , वेशभूषा , और मंच सजावट के लिए काबुकी पूरे दुनिया में जानी जाती है।   अपने विशेष प्रकार के संगीत व ध्वनि के लिए  , काबुकी दुनिया भर के दर्शकों के साथ लोकप्रिय हो गया है। 

काबुकी के कलाकार बहोत ही रमे हुए होते है।  काबुकी के अंतर्गत दिखायी जाने वाली चीजे अक्सर समाज पर गहरा प्रभाव छोड़ता है।  जापान के दर्शको के लिए काबुकी सिर्फ एक आर्ट ही नहीं बल्कि लोगो कि पहचान भी है।  काबुकी में अन्य थिएटर आर्ट कि तरह भावनाओ का अधिका धिक् प्रदर्शन न होकर , उनके द्वारा किये जाने वाले एक्शन से होता है। 

अगर आज के समय में हम काबुकी कि बात करे तो , ये बड़ा ही नीरस होगा।  क्योकि आज जहां  मनोरंजन के इतने अधिक साधन , टेलीविज़न , फ़िल्म , इंटरनेट है ऐसे में इस प्रकार के कला को देखना लोग उतना पसंद नहीं करेंगे पर काबुकी का अपना अलग ही महत्व है। 



काबुकी नाटक के दौरान दिखाए जाने वाले दृश्यों में श्रंखला बद्ध जुड़ाव होता है , जो एक सिरे से चलते चलते आखिरी सिरे तक जाती है।   काबुकी में जो भी दिखाया जाता है , अन्य थिएटर आर्ट कि तरह नहीं होता।  कहने का तात्पर्य  अगर हम भारतीय थिएटर आर्ट को देखें तो इसमें अधिका अधिक संवाद व एक्शन होते है , जबकि काबुकी में इन सब बातो का उतना महत्व नहीं होता। 

काबुकी में अगर नाटक का  मुख्य पात्र अगर किसी अन्य पात्र को मरता है तो, उसे उसको मरने के  के दृश्य को कई अन्य भाग में या तो धीरे - धीरे दिखाया जाता है।  मुख्य कलाकार एक बार हाथ उठाएगा तो दूसरे सीन में वो हाथ या डंडे से विरोधी पत्र पर हमला करेगा , और ये हमला तेज ना होकर धीरे धीरे मानो स्लो मोशन में होता है। 


ऐसे ही अगर मुख्य पात्र को गुस्से में दिखाया जाता है , तो वो अपने पैर पटकता है , साथ ही बड़ी बड़ी आँखे कर विकराल चेहरा बना कर आगे बढता है , जिसे देख विरोधी पात्र अपने आप पीछे हटने लगते है।  



                     रचनात्मकतावाद  (constructivism)





रचनवाद कुछ नया सीखने की एक कला है।  अपनी वर्तमान स्थितियों को भांप कर कुछ ऐसा करना जो एक दम से नया वा रचनात्मक लगे रचनात्मकतवाद का सिद्धान्त कहलाता है।  ये रचनात्मक सिद्धान्त जीवन के किसी भी क्षेत्र में लागू हो सकता है , शिक्षा से लेकर कला हर क्षेत्र में इसकी विशेष भूमिका है। 

अगर हम फिल्मो में रचनवाद की बात करे तो इसकी भूमिका इस क्षेत्र में बहुत महत्वपूर्ण होती है।  किस तरह फ़िल्म निर्माता समाज के ही मुद्दो व समस्याओ को दर्शको के सामने एक नए विषय की तरह प्रस्तुत करता है , वो उसकी रचनात्मक सोच होती है। 

फ़िल्म हमेशा से ही समाज पर गहरा प्रभाव छोड़ती है , ऐसे में फिल्मो में रचनात्मकता का  होना बहोत जरुरी होता है। फ़िल्म में अगर कुछ नया ना दिखाया जाये तो शायद दर्शक एक ही चीज देख कर बोर हो जाए।  रचनतमक कार्य समाज  के लिये एक आइना भी दीखता है , जो हम नयी चीज देखते है उसके अपने लाइफ में उपयोग करते है , जो हमारे जीवन को भी एक नयी रचना से जोड़ता है। 

कुछ ऐसे डायरेक्टर है जिनके कार्यो में हमेशा रचनात्मकताए झलकती है , और इन्ही रचनात्मताओ के कारण उनका फ़िल्म जगत में विशेष नाम है।  रचनात्मकताए कोई नयी चीज या बाहर से नहीं आती ये हमारे सोच व व्यक्तिगत अनुभव का एक परिणाम होता है। 


रचनात्मक कार्य हमारे कार्य को ना केवल लोगो से अलग बनाता है , बल्कि  एक वहदा भी देता है।  समाज में  हो  रहे अच्छे बुरे परिवर्तन उसका समाज पर प्रभव तथा उसके कारन हो रहे लोगो के जीवन शैली में बदलाव ऐसे कई मुद्दे है , जिसे देखने व बताने के लिए रचनात्मक नजरिये की जरुरत होती है।

ये रचनात्मक नजरिया तभी हमारे अंदर आएगा जब हम उससे जुड़े रहेंगे।  कहना का तात्पर्य हम जितना समाज व लोगो के  कार्यो के करीब रहेंगे उतना ही रचनात्मक सोच अपने काम में अपने व्यक्तिगत अनुभव के अंतर्गत डाल सकते है। 


                    

                        मिथ्य ऑफ़ सिनेमा




बजीं  के अनुसार सिनेमा या फोटोग्राफी का उद्भव अत्याधुनिक तकनिकी के साथ नहीं हुआ था।  उनका ये भी तर्क था कि सिनेमा का शुरुआती  समय आर्थिक रूप से इतना समृद्ध भी नहीं था।  अगर हम प्राम्भ में सिनेमा के बारे में सोचे तो उस समय तकनिकी का बहुत ज्यादा आभाव था , साथ ही फ़िल्म के निर्देशक व निर्माता के पास उतना पैसा भी नहीं हुआ करता था।  शुरआती दौर में अगर हम सिनेमा या फोटोग्राफ कि बात करे तो , इनका उद्देश्य सिर्फ फायदा कमाना नहीं था , बल्कि फिल्मो व उसके समकक्ष कलाओ का उपयोग समाज में जागरूकता व सामाजिक विकास था। 

बजी के अनुसार फोटोग्राफी या फ़िल्म के बारे में  शुरुआत करने वाले लोगो का उद्देश्य सिर्फ अपनी तकनिकी को बेचना नहीं था , उनका मनाना  था , कि इस विधा से समाज व देश को एक नया दिशा मिले जिससे लोगो में बदलाव कि अलख जगे और वो अपने आप और दुसरो के भी फायदे के बारे में सोचे। 

सिनेमा एक आदर्शवादी सोच है जो समाज में आदर्शात्मक भाव को बढ़ावा देता है , पर जैसे - जैसे तकनिकी का पदार्पण इस क्षेत्र में होता गया इसके आदर्शात्मकता की  छवि धूमिल पड़ने लगी , व लोग इसको एक व्यवसाय की  तरह स्थापित कर दिए। 

बजी के अनुसार सिनेमा की  अच्छी समझ के लिए उसका   तकनिकी व  आर्थिक दृष्टिकोण से थोड़ा हट के होना चाहिए।  तकनिकी का बहुत ज्यादा उपयोग सिनेमा कि आत्मा को छिपा देता है।  सिनेमा में जीतनी  वास्तविकता होगी उतना उसका महत्व होगा पर तकनिकी के आगे सिनेमा का महत्व तो रहेगा पर सत्यता का उसमे लोप होगा। 


आज अगर हम ध्यान से उनके तर्कों को सोचे तो कही न कही उनका तर्क सही था , आज सिनेमा पूरी तरह तकनिकी पर निर्भर है।  दिन प्रतिदिन सिनेमा में हो रहे तकनिकी के प्रयोग  से लोगो का आकर्षण तो सिनेमा के तरफ बढ़ रहा है , पर जो इसकी आत्मा है , ये जो सिनेमा का प्रारम्भिक दिनों में होता था आज उन सब बातो का  नगण्यपन  सिनेमा में देखने को मिलता है।