ह्यूगो मनसटरबर्ग....
ह्यूगो मनसटरबर्ग एक जर्मन - अमेरिकन मनोवैज्ञानिक थे। उनको साहित्य , कविता , विदेशी भाषा , व संगीत से बड़ा लगाव था। और अपने इस लगाव को अपनी सोच का हिस्सा बनाते गए , और एक दिन एक महान मनोवैज्ञानिक बने। फिल्मो को ऑब्ज़र्व करने का उनका अपना अलग हीअंदाज था।
सिनेमा दिमाग कि कला है , जिसे हम दिमाग से समझते है, ठीक उसी तरह जैसे संगीत को कान , से चित्रकला को आँख से। सिनेमा सामाजिक ताना वाना व तकनिकी का समन्वय है। जिसके माध्यम से हम किसी भी विषय को व्यापक स्तर पर समझते है।
ह्यूगो मनसटरबर्ग कमेरा व उसके प्रयोग के बारे में बताते हुए कहते है , कि क्लोज अप शॉट्स व विभिन्न प्रकार के कैमेरा छोर कैमरा के लेन्स से नहीं बल्कि इंसान कि सोच से होता है। यह एक फ़िल्म निर्देक के कार्य कुशलता पर निर्भर करता है , कि वह कैसे व किस प्रकार से इन तकनीकियों का फ़िल्म में प्रयोग करता है।
फ़िल्म हमारे मानसिक स्थिति का प्रतिविम्व होता है , जो हमारी मानसिक सोच को प्रतिबिंबित करता है। फ़िल्म संसार और हमारे बीच कि कड़ी नहीं , बल्कि ये हमारे सोच और फ़िल्म के बिच कि कड़ी है। फ़िल्म एक ऑब्जेट है , जो हमारे दिमाग को प्रभावित करती है।
वास्तव में फ़िल्म एक ओब्जक्ट ही है , जिसे कई भागो में जोड़कर दिखया जाता है। उनका जो व्यक्तिगत सोच फ़िल्म के बारे में था , वो था , कि फ़िल्म बिना कहानी के मात्र एक उपकरण है , जिसे प्रयोग करने के लिए कहानी कि जरुरत होती है। फ़िल्म में कहानी का होना बहुत जरुरी होता है।
ये कहानी कुछ भी नहीं होने चाहिए , कहानी वो होने चाहिए जिसके सामाजिक विकास व समाज उत्थान में भूमिका हो। फ़िल्म में खासकर तीन चीज होती है , सूचना , शिक्षा व मनोरंजन। ये तीन चीजे फ़िल्म के कहानी को आगे बढ़ाती है। किसी भी फ़िल्म में इन तीन चीजो का होना बहुत आवशयक होता है ,
ह्यूगो मनसटरबर्ग एक जर्मन - अमेरिकन मनोवैज्ञानिक थे। उनको साहित्य , कविता , विदेशी भाषा , व संगीत से बड़ा लगाव था। और अपने इस लगाव को अपनी सोच का हिस्सा बनाते गए , और एक दिन एक महान मनोवैज्ञानिक बने। फिल्मो को ऑब्ज़र्व करने का उनका अपना अलग हीअंदाज था।
सिनेमा दिमाग कि कला है , जिसे हम दिमाग से समझते है, ठीक उसी तरह जैसे संगीत को कान , से चित्रकला को आँख से। सिनेमा सामाजिक ताना वाना व तकनिकी का समन्वय है। जिसके माध्यम से हम किसी भी विषय को व्यापक स्तर पर समझते है।
ह्यूगो मनसटरबर्ग कमेरा व उसके प्रयोग के बारे में बताते हुए कहते है , कि क्लोज अप शॉट्स व विभिन्न प्रकार के कैमेरा छोर कैमरा के लेन्स से नहीं बल्कि इंसान कि सोच से होता है। यह एक फ़िल्म निर्देक के कार्य कुशलता पर निर्भर करता है , कि वह कैसे व किस प्रकार से इन तकनीकियों का फ़िल्म में प्रयोग करता है।
फ़िल्म हमारे मानसिक स्थिति का प्रतिविम्व होता है , जो हमारी मानसिक सोच को प्रतिबिंबित करता है। फ़िल्म संसार और हमारे बीच कि कड़ी नहीं , बल्कि ये हमारे सोच और फ़िल्म के बिच कि कड़ी है। फ़िल्म एक ऑब्जेट है , जो हमारे दिमाग को प्रभावित करती है।
वास्तव में फ़िल्म एक ओब्जक्ट ही है , जिसे कई भागो में जोड़कर दिखया जाता है। उनका जो व्यक्तिगत सोच फ़िल्म के बारे में था , वो था , कि फ़िल्म बिना कहानी के मात्र एक उपकरण है , जिसे प्रयोग करने के लिए कहानी कि जरुरत होती है। फ़िल्म में कहानी का होना बहुत जरुरी होता है।
ये कहानी कुछ भी नहीं होने चाहिए , कहानी वो होने चाहिए जिसके सामाजिक विकास व समाज उत्थान में भूमिका हो। फ़िल्म में खासकर तीन चीज होती है , सूचना , शिक्षा व मनोरंजन। ये तीन चीजे फ़िल्म के कहानी को आगे बढ़ाती है। किसी भी फ़िल्म में इन तीन चीजो का होना बहुत आवशयक होता है ,
















