मिथ्य ऑफ़ सिनेमा
बजीं के अनुसार
सिनेमा या फोटोग्राफी का उद्भव अत्याधुनिक तकनिकी के साथ नहीं हुआ था। उनका ये भी तर्क था कि सिनेमा का शुरुआती समय आर्थिक रूप से इतना समृद्ध भी नहीं
था। अगर हम प्राम्भ में सिनेमा के बारे
में सोचे तो उस समय तकनिकी का बहुत ज्यादा आभाव था , साथ ही फ़िल्म के निर्देशक व निर्माता के पास
उतना पैसा भी नहीं हुआ करता था। शुरआती
दौर में अगर हम सिनेमा या फोटोग्राफ कि बात करे तो , इनका उद्देश्य सिर्फ फायदा कमाना नहीं था , बल्कि फिल्मो व
उसके समकक्ष कलाओ का उपयोग समाज में जागरूकता व सामाजिक विकास था।
बजी के अनुसार फोटोग्राफी या फ़िल्म के बारे में शुरुआत करने वाले लोगो का उद्देश्य सिर्फ अपनी
तकनिकी को बेचना नहीं था ,
उनका मनाना था , कि इस विधा से समाज व देश को एक नया दिशा मिले जिससे लोगो
में बदलाव कि अलख जगे और वो अपने आप और दुसरो के भी फायदे के बारे में सोचे।
सिनेमा एक आदर्शवादी सोच है जो समाज में आदर्शात्मक भाव को
बढ़ावा देता है , पर जैसे - जैसे
तकनिकी का पदार्पण इस क्षेत्र में होता गया इसके आदर्शात्मकता की छवि धूमिल पड़ने लगी , व लोग इसको एक
व्यवसाय की तरह स्थापित कर दिए।
बजी के अनुसार सिनेमा की
अच्छी समझ के लिए उसका तकनिकी
व आर्थिक दृष्टिकोण से थोड़ा हट के होना
चाहिए। तकनिकी का बहुत ज्यादा उपयोग
सिनेमा कि आत्मा को छिपा देता है। सिनेमा
में जीतनी वास्तविकता होगी उतना उसका
महत्व होगा पर तकनिकी के आगे सिनेमा का महत्व तो रहेगा पर सत्यता का उसमे लोप
होगा।
आज अगर हम ध्यान से उनके तर्कों को सोचे तो कही न कही उनका
तर्क सही था , आज सिनेमा पूरी
तरह तकनिकी पर निर्भर है। दिन प्रतिदिन
सिनेमा में हो रहे तकनिकी के प्रयोग से
लोगो का आकर्षण तो सिनेमा के तरफ बढ़ रहा है , पर जो इसकी आत्मा है , ये जो सिनेमा का प्रारम्भिक दिनों में होता था आज उन सब
बातो का नगण्यपन सिनेमा में देखने को मिलता है।


No comments:
Post a Comment