रचनात्मकतावाद (constructivism)
रचनवाद कुछ नया सीखने की एक कला है। अपनी वर्तमान स्थितियों को भांप कर कुछ ऐसा
करना जो एक दम से नया वा रचनात्मक लगे रचनात्मकतवाद का सिद्धान्त कहलाता है। ये रचनात्मक सिद्धान्त जीवन के किसी भी क्षेत्र
में लागू हो सकता है , शिक्षा से लेकर
कला हर क्षेत्र में इसकी विशेष भूमिका है।
अगर हम फिल्मो में रचनवाद की बात करे तो इसकी भूमिका इस
क्षेत्र में बहुत महत्वपूर्ण होती है। किस
तरह फ़िल्म निर्माता समाज के ही मुद्दो व समस्याओ को दर्शको के सामने एक नए विषय की
तरह प्रस्तुत करता है , वो उसकी रचनात्मक
सोच होती है।
फ़िल्म हमेशा से ही समाज पर गहरा प्रभाव छोड़ती है , ऐसे में फिल्मो
में रचनात्मकता का होना बहोत जरुरी होता
है। फ़िल्म में अगर कुछ नया ना दिखाया जाये तो शायद दर्शक एक ही चीज देख कर बोर हो
जाए। रचनतमक कार्य समाज के लिये एक आइना भी दीखता है , जो हम नयी चीज
देखते है उसके अपने लाइफ में उपयोग करते है , जो हमारे जीवन को भी एक नयी रचना से जोड़ता है।
कुछ ऐसे डायरेक्टर है जिनके कार्यो में हमेशा रचनात्मकताए
झलकती है , और इन्ही
रचनात्मताओ के कारण उनका फ़िल्म जगत में विशेष नाम है। रचनात्मकताए कोई नयी चीज या बाहर से नहीं आती
ये हमारे सोच व व्यक्तिगत अनुभव का एक परिणाम होता है।
रचनात्मक कार्य हमारे कार्य को ना केवल लोगो से अलग बनाता
है , बल्कि एक वहदा भी देता है। समाज में
हो रहे अच्छे बुरे परिवर्तन उसका
समाज पर प्रभव तथा उसके कारन हो रहे लोगो के जीवन शैली में बदलाव ऐसे कई मुद्दे है
, जिसे देखने व
बताने के लिए रचनात्मक नजरिये की जरुरत होती है।
ये रचनात्मक नजरिया तभी हमारे अंदर आएगा जब हम उससे जुड़े
रहेंगे। कहना का तात्पर्य हम जितना समाज व
लोगो के कार्यो के करीब रहेंगे उतना ही
रचनात्मक सोच अपने काम में अपने व्यक्तिगत अनुभव के अंतर्गत डाल सकते है।


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