काबुकी परंपरागत
जापानी थियेटर शैली .
काबुकी जापान की एक
बहु पुरानी थिएटर आर्ट है। काबुकी के
अंतर्गत नाट्य शैलियों की अच्छी तरह से
जाना जाता है। नाटक ; अभिनेताओं ' गतियों की लयबद्ध
अनुग्रह , रंगीन मेकअप , वेशभूषा , और मंच सजावट के
लिए काबुकी पूरे दुनिया में जानी जाती है।
अपने विशेष प्रकार के संगीत व ध्वनि के लिए , काबुकी दुनिया भर के दर्शकों के साथ लोकप्रिय हो गया
है।
काबुकी के कलाकार बहोत ही रमे हुए होते है। काबुकी के अंतर्गत दिखायी जाने वाली चीजे अक्सर
समाज पर गहरा प्रभाव छोड़ता है। जापान के
दर्शको के लिए काबुकी सिर्फ एक आर्ट ही नहीं बल्कि लोगो कि पहचान भी है। काबुकी में अन्य थिएटर आर्ट कि तरह भावनाओ का
अधिका धिक् प्रदर्शन न होकर , उनके द्वारा किये जाने वाले एक्शन से होता है।
अगर आज के समय में हम काबुकी कि बात करे तो , ये बड़ा ही नीरस
होगा। क्योकि आज जहां मनोरंजन के इतने अधिक साधन , टेलीविज़न , फ़िल्म , इंटरनेट है ऐसे
में इस प्रकार के कला को देखना लोग उतना पसंद नहीं करेंगे पर काबुकी का अपना अलग
ही महत्व है।
काबुकी नाटक के दौरान दिखाए जाने वाले दृश्यों में श्रंखला
बद्ध जुड़ाव होता है , जो एक सिरे से
चलते चलते आखिरी सिरे तक जाती है। काबुकी
में जो भी दिखाया जाता है ,
अन्य थिएटर आर्ट
कि तरह नहीं होता। कहने का तात्पर्य अगर हम भारतीय थिएटर आर्ट को देखें तो इसमें
अधिका अधिक संवाद व एक्शन होते है , जबकि काबुकी में इन सब बातो का उतना महत्व नहीं होता।
काबुकी में अगर नाटक का
मुख्य पात्र अगर किसी अन्य पात्र को मरता है तो, उसे उसको मरने
के के दृश्य को कई अन्य भाग में या तो
धीरे - धीरे दिखाया जाता है। मुख्य कलाकार
एक बार हाथ उठाएगा तो दूसरे सीन में वो हाथ या डंडे से विरोधी पत्र पर हमला करेगा , और ये हमला तेज
ना होकर धीरे धीरे मानो स्लो मोशन में होता है।
ऐसे ही अगर मुख्य पात्र को गुस्से में दिखाया जाता है , तो वो अपने पैर
पटकता है , साथ ही बड़ी बड़ी
आँखे कर विकराल चेहरा बना कर आगे बढता है , जिसे देख विरोधी पात्र अपने आप पीछे हटने लगते है।


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