Friday, 7 March 2014



                         
                           दर्शक  ( spectator )





कला कोई भी हो अगर जब तक उसका दर्शक ना हो कला का कोई महत्व नहीं होता।  किसी भी कला के लिए दर्शक सिर्फ इसलिए महत्वपूर्ण नहीं कि वो उसे देखते है , बल्कि इसलिए भी महत्वपूर्ण होता ही , कि उसके द्वारा दिए गए फीडबैक से कलाकार का सम्मान व विश्वास बढता है। अगर   एक दर्शक किसी भी कला का आलोचक होता है तो साथ ही साथ वो उसका समालोचक भी होता है।  जरुरत पड़ने पर सराहना  करता है , तो वही खमियां दिखने पर आलोचना भी करता है। 

दर्शक के सराहने पर ही कला व कलाकार का महत्व बढता है।  आदिकाल से ये धारणा चली आ रही है , कि अगर कोई कला उसके दर्शको को पसंद ना आये तो वो कला ही नहीं बल्कि कलाकारदोनो ही व्यर्थ है।  पहले के जमाने में तो अगर राजा महराजा को कलाकारो कि कलाकारी अगर पसंद नहीं आती  थी , तो उन्हें इसकी सजा दी जाती थी।  कभी = कभी तो उनके कला के लिए उन्हें सजाये मौत भी दे दी जाती थी।  उदाहरण के तौर पर ताजमहल का कारीगर हालाँकि यहाँ उसको इसलिए नहीं मारा गया , कि उसकी कलाकारी बेकार थी , बल्कि इस लिए मरा गया कि वो दुबारा ऐसा नायाब चीज ना बना सके। हालाँकि ये तो हो गया कला व कलाकार की बात।  पर आज यहाँ हैम जिस दर्शक कि बात कर रहे है वो  मुखतः फ़िल्म का दर्शक होताहै।  



आज वर्त्तमान  में दर्शको का स्तर व महत्व काफी बढ़ गया है , अब दर्शक कला को सिर्फ मनोरंजन कि दृष्टि से ही नहीं बल्कि शिक्षा , संस्कृति, ज्ञान व कई अन्य  दृष्टिकोण से देखतेहै।  अगर आज के दर्शको को एक आलोचक कहा जाए तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। 

  हर दर्शक का कला   को देखने का नजरिया एक ही नहीं  होता।  कुछ किसी दृष्टिकोण से देखते है तो कुछ किसी और दृष्टिकोण से देखते है।  कोई भी कला कार जब तक अपने अभिनय से दर्शक के दिल को ना छू ले कला नीरस व बेजान होता है। 

कलाकार व दर्शक का संबंध बहुत ही गहरा होता है।  अगर हम कहे कि एक के बिना दूसरे का कोई अस्तित्व नहीं तो ये भी गलत नहीं होगा।  अगर दर्शक कला को देखने में रूचि ही ना दिखाए तो कला का क्या मतलब और अगर कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन ही ना करे तो दर्शक का क्या काम ?


एक दर्शक तो पूरी तरह समीक्षक नहीं होता , फिर भी उसके अंदर वो सारे गुण होते है जिसके अनुसार वो किसी कला को  अपने विवेक से परखता सकता  है।  


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