Friday, 7 March 2014



                                                   Rasa theory  (रस सिद्धांत)





 रस थ्योरी किसी कला का स्वाद है।  जिसके आभाव में कला स्वाद हिन् है।  जीवन में जैसे विभिन्न प्रकार के समय आते जाते है और उनके अनुसार हमरे जीने के तरीके में बदलाव होता है ठीक उसी तरह रसा थ्योरी नाटक में बदलाव को व्यक्त रस सिद्धांत करती है। 

रसा थ्योरी के बारे में बताया जाता है कि इसकी खोज भारत में हुयी थी।  भारत मुनि वो पहले इंसान थे जिसने रस थ्योरी वा इसकी उपयोगिता का अध्यायन किया।  रसा थ्योरी मुखतः नृत्य , नाटक के भावो को अभव्यक्त करती है।  नाटक एक ऐसी कला है जो लोगो का न केवल मनोरंजन करती है, बल्कि लोगो को शिक्षित व जागरूक भी करती है।  ऐसे में बड़ा प्रश्न ये उठता है , कि कैसे हैम अपने नाटक का प्रस्तुतीकरण करे कि वो अधिक से अधिक लोगो को प्रभावित कर सके। 

नाटक में मुख्यतः ध्वनि व भावनाओ का अभिव्यक्तिकरण ही ऐसे दो घटक है , जो नाटक के अर्थ  को दर्शको को समझाती है। भारतीय परिप्रेक्ष्य में यदि हैम बात करे तो आज फिल्मो व टेलीविज़न के इतने प्रभाव के बावजूद भी लोगो का लगाव नाटक  के प्रति बना है।  जिसका दो कारन हो सकता है एक तो वास्तविक कला को देखने के प्रति लोगो कि रूचि व दूसरा जटिल से जटिल विषयो को नाटक के माध्यम से समझना। 

रसा थ्योरी के अनुसार आठ भावो को मुनष्य के अंदर देखा जा सकता है , तथा जिसके अभिव्यक्ति कारन मनुष्य द्वारा होता है।   ये आठो रसा किसी भी नाटक या नृत्य के लिये शारीर में आत्मा कि तरह होती है। 

रस के आठ प्रकार - श्रृंगार रस , हास्य रस ,रौद्र रस , करुण रस , वीभत्स रस , भयानक रस , वीर रस व अद्भुत रस।  ये वो आठ रस है जो भरत मुनि ने प्रस्तुत किया था , आगे चलकर अभिनव गुप्ता जो कि एक बड़े स्कॉलर थे उन्होंने नौए रस कि बात कही।  उन्होंने बताया कि एक और रस है जो इन्ही रसो के भाति महत्वपूर्ण व उपयोगी है।  अभिनव गुप्ता के अनुसार शांत रस भी एक आवश्यक रस है जो रसा थ्योरी का भाग है। 



उपरोक्त हाथो रासो के बारे में बता दिया गया है , अब प्रश्न है , कि हर रस एक दूसरे से किस तरह भिन्न है व उसकी अपनी क्या पहचान है।  जो पहला रस है वो है है श्रृंगार रस जिसका मतलब प्यार , मोहब्बत व लगाव से होता है  . इस रस को हरे रंग से प्रदर्शित किया जाता है।  जब नाटक में हमें कुछ ऐसा दिखाना होता है तो या तो हम स्टेज के लाइट का रंग हरा कर देते है , या कलाकारो के चहरे को हरे रंग से प्रदर्शित करते है। 

दूसरा रस हास्य है जिसका तात्पर्य मनोरंजन से होता है।  नाटक में मनोरंजन का होना बहुत जरुरी है अतः इस रस के माध्यम से कलाकार अपने दर्शको को अपने भावो को बताताहै।  जो अगला रस है वो है रौद्र जैसा कि नाम से ही पता चलता है इसका तात्पर्य गुस्से से होता है।   जब हमारे इच्छाओ को अनदेखा किया जाए या  तो अक्सर हमें सामने वाले इंसान पर गुस्सा आता है जो रौद्र रस को प्रदर्शित करता है। 

करुणा रस हमरे मानवी संवेदनाओ का व्यक्ति करण है , जिसका तात्पर्य मोह माया , व दयालुता से जुड़ा होता है।  इस रस को ग्रे कलर से प्रदर्शित किया जता है।  वीभत्स रस इस रस को नीले रंग से प्रदर्शित किया जाता है।  इस रस का तात्पर्य  कुछ ऐसी चीजो से होता है जो हमें पसंद ना हो , जिससे हमें घृणा आती हो।  जो अगला रस है वो है भयानक रस जिसका तात्पर्य आतंक से जुड़ा होता है , ऐसा कुछ भी जो लोगो को भयभीत करे , डराये ये लोगो में आतंक फैलाये वो इस रस के अंतर्गत आता है।  इस रस को काले रंग से प्रदर्शित किया जता है।



रस की जब हम आगे बात करते है तो अगला रस है वीर जिसका जुड़ाव शौर्य , उत्साह  व प्रक्रम से होता है इस रस को पीले रंग से प्रदर्शित किया जाता है।  जो अंतिम रस है वो है अद्भुत जैसा कि नाम से ही पता चलता है ये कुछ ऐसे भाव के बारे में बात करता है जो एक दम आश्चर्यचकित कर देने वाला हो , मतलब कुछ ऐसा अविश्सनीय हो।  इस रस को पीले रंग से प्रदर्शित किया जाताहै।  अभिनव गुप्ता द्वारा जोड़ा गया शांत रस शांति व शंतुष्टि के बारे में बात करती है , इस रस को नीले रंग से प्रदर्शित किया जता है। 


ये थे वो रस जो भारतीय पारम्परिक नाटको कि आत्मा है , जिसके बिना नाटक नीरस व वेसवाद है।

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