नाट्यशास्त्र
नाटकों के संबंध में शास्त्रीय जानकारी को नाट्य शास्त्र
कहते हैं। इस जानकारी का सबसे पुराना ग्रंथ भी नाट्य-शास्त्र के नाम से जाना जाता
है। इसके रचयिता भरत मुनि थे। भरत मुनि का काल ४०० ईपू के निकट माना जाता है।
संगीत, नाटक, और अभिनय के संपूर्ण ग्रंथ के रूप में भारतमुनि
के नाट्य शास्त्र का आज भी बहुत सम्मान है। उनका मानना है कि नाट्य शास्त्र में
केवल नाट्य रचना के नियमों का आकलन नहीं होता बल्कि अभिनेता रंगमंच और प्रेक्षक इन
तीनों तत्वों की पूर्ति के साधनों का विवेचन होता है।
37 अध्यायों में भरतमुनि ने रंगमंच अभिनेता अभिनय
नृत्यगीतवाद्य, दर्शक, दशरूपक और रस निष्पत्ति से संबंधित सभी तथ्यों
का विवेचन किया है। भरत के नाट्य शास्त्र के अध्ययन से यह स्पष्ट हो जाता है कि
नाटक की सफलता केवल लेखक की प्रतिभा पर आधारित नहीं होती बल्कि विभिन्न कलाओं और
कलाकारों के सम्यक के सहयोग से ही होती है।
नाट्यशास्त्र (भारतीय) नाट्य और नृत्त, दृश्य काव्य के
ये दो भेद हैं। नट नटी द्वारा किसी अवस्थाविशेष की अनुकृति नाट्य है - 'नाट्यते
अभिनयत्वेन रूप्यते- इति नाट्यम्'। ताल और लय की संगति से अनुबद्ध अनुकृत को
नृत्त कहते हैं। ये दोनों ही अभिनय के विषय हैं और ललित कला के अंतर्गत माने जाते
हैं। नाट्य के प्रमुख अंग चार हैं - वाचिक, सात्विक, आंगिक और आहार्य।
उक्ति-प्रत्युक्ति की यथावत् अनुकृति वाचिक अभिनय का विषय है।
भावों का यथावत्
प्रदर्शन सात्विक अभिनय है। भावप्रदर्शन के लिए हाथ, पैर, नेत्र, भ्रू, एवं कटि, मुख, मस्तक आदि अंगों
की विविध चेष्टाओं की अनुकृति आंगिक अभिनय है। देशविदेश के अनुरूप वेशभूषा, चालढाल, रहन सहन और बोली
की अनुकृति आहार्य अभिनय का विषय है। चतुर्विध अभिनय के सहायक नृत्य, गीत, वाद्य एवं गति, वृत्ति, प्रवृत्ति और आसन
का अनुसंधान भी नाट्य के अंतर्गत है। इस प्रकार अभिनय के विविध अंग एवं उपांगों के
स्वरूप और प्रयोग के आकारप्रकार का विवरण प्रस्तुत कर तत्संबंधी नियम तथा व्यवहार
को निर्धारित करनेवाला शास्त्र 'नाट्यशास्त्र' है।
इस प्रकार अभिनय के विविध अंग एवं उपांगों के स्वरूप और
प्रयोग के आकारप्रकार का विवरण प्रस्तुत कर तत्संबंधी नियम तथा व्यवहार को
निर्धारित करनेवाला शास्त्र 'नाट्यशास्त्र' है। अभिनय के
अनुरूप स्थान को नाट्यगृह कहते हैं जिसके प्रकार, निर्माण एवं
साजसज्जा के नियमों का प्रतिपादन भी नाट्यशास्त्र का ही विषय है। विविध श्रेणी के
अभिनेता एवं अभिनेत्री के व्यवहार, परस्पर संलाप और
अभिनय के निर्देशन एवं निर्देशक के कर्तव्यों का विवरण भी नाट्यशास्त्र की व्यापक
परिधि में समाविष्ट है।
इसका मुख्य
उद्देश्य ऐहिक जीवन की नाना वेदनाओं से परिश्रांत जनता का मनोरंजन है - यह देव, दानव एवं मानव
समाज के लिए आमोद प्रमोद का सरल साधन है। यह नयनों की तृप्ति करनेवाला एवं
भावोद्रेक का परिमार्जन कर प्रेक्षकवर्ग का आह्लादित करनेवाला मनोरम अनुसंधान है -
यह जातिभेद, वर्गभेद, वयोभेद आदि नैसर्गिक एवं सामाजिक विभेदों से
निरपेक्ष, भिन्न रुचि की जनता का सामान्य रूप से समाराधन करनेवाला एक
कांत, 'चाक्षुषक्रतु' है।


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